सुमित्रानंदन पंत की कविता पतझड़ | Sumitranandan Pant Poem Patjhad

Sumitranandan Pant Nature Poem Patjhad:- भारत के महान कवि जिन्होंने अपनी कविताओं से देश दुनिया को कई सारे उपदेश और मार्गदर्शन दिखाएं जिससे मानव अपना जीवन खुशहाली से जी सके, पंत जी ने अपने जिंदगी में कई बहोत सारे कविताओं की रचना की उन्हीं में से एक कविता है जिसका नाम सुमित्रा नंद जी ने पतझड़ रखा हैं। यह कविता भारत के अलावा और भी कई देशों में भी पहुंचा जहां जहां हमारे हिंदी भाषा के पढ़ने लिखने वाले लोग थे। 

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Sumitranandan Pant Nature Poetry in Hindi - सुमित्रानंदन पंत की कविता पतझड़

झरो, झरो, झरो,
जंगम जग प्रांगण में,
जीवन संघर्षण में
नव युग परिवर्तन में
मन के पीले पत्तो!
झरो, झरो, झरो,

सन सन शिशिर समीरण
देता क्रांति निमंत्रण!
यह जीवन विस्मृति क्षण,
जीर्ण जगत के पत्तो!
टरो, टरो, टरो!

कँप कर, उड़ कर, गिर गर,
दब कर, पिस कर, चर मर,
मिट्टी में मिल निर्भर,
अमर बीज के पत्तो!
मरो! मरो! मरो!

तुम पतझर, तुम मधु--जय!
पीले दल, नव किसलय,
तुम्हीं सृजन, वर्धन, लय,
आवागमनी पत्तो!
सरो, सरो, सरो!

जाने से लगता भय?
जग में रहना सुखमय?
फिर आओगे निश्चय।
निज चिरत्व से पत्तो!
डरो, डरो, डरो!

जन्म मरण से होकर,
जन्म मरण को खोकर,
स्वप्नों में जग सोकर,
मधु पतझर के पत्तो!
तरो, तरो, तरो!

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पतझड़ हिंदी कविता जिसे सुमित्रानंदन पंत जी ने लिखी थी इस कविता में पंत जी ने मानव जीवन में होने वाली घटनाओं और पेड़ पौधों प्रकृति में होने वाली कुछ समान बातों का ध्यान रखकर इस कविता में पंत जी ने लिखा है उम्मीद करूंगा कि आपको प्रकृति पर लिखी गई कविता आपको बहुत पसंद आई होगी और आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप इस कविता को अपने मित्रों के साथ भी शेयर करें।