Sumitranandan Pant Poems in Hindi | सुमित्रानंदन पंत की कविता

भारत के महान काव्य रचयिता सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बागेश्वर ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई 1900 ई॰ को हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया जिसके कारण सुमित्रानंदन की दादी ने इनका पालन पोषण करना पड़ा, पिता गंगादत्त पंत की आठवीं संतान होने के कारण इनका नाम बचपन में गोसाईं दत्त रखा गया परन्तुु कवि को ये नाम पसंद नहीं आया इसलिए गोसाईं दत्त नाम को बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया इसके बाद ये काशी मे अधिक पढ़ाई करने के लिए इनो ने क्वींस कॉलेज में हिन्दी साहित्य की पड़ाई की।


सुमित्रानंदन पंत की कविताएं | Sumitranandan Pant Poems in Hindi

जीना अपने ही में -सुमित्रानंदन पंत 

जीना अपने ही में
एक महान कर्म है,
जीने का हो सदुपयोग
यह मनुज धर्म है।

अपने ही में रहना
एक प्रबुद्ध कला है,
जग के हित रहने में
 सबका सहज भला है।

जग का प्यार मिले
जन्मों के पुण्य चाहिए,
जग जीवन को
 प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए।

ज्ञानी बनकर
मत नीरस उपदेश दीजिए,
लोक कर्म भव सत्य
प्रथम सत्कर्म कीजिए।

1.सुमित्रानंदन पंत की कविता भारत माता

भारत माता ग्रामवासिनी।
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी कि प्रतिमा उदासिनी।

दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में प्रवासिनी।

तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक तरु तल निवासिनी!

स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित शरदेन्दु हासिनी।

चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़ गीता प्रकाशिनी!

सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,
जग जननी जीवन विकासिनी।

2. सुमित्रानंदन पंत की कविता बादल

सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!

 काले बादल जाति द्वेष के,
 काले बादल विश्‍व क्‍लेश के,
 काले बादल उठते पथ पर
 नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के!

सुनता आया हूँ, है देखा,
काले बादल में हँसती चाँदी की रेखा!

 आज दिशा हैं घोर अँधेरी
 नभ में गरज रही रण भेरी,
 चमक रही चपला क्षण-क्षण पर
 झनक रही झिल्‍ली झन-झन कर!

नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका
काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

 काले बादल, काले बादल,
 मन भय से हो उठता चंचल!
 कौन हृदय में कहता पलपल
 मृत्‍यु आ रही साजे दलबल!

आग लग रही, घात चल रहे, विधि का लेखा!
काले बादल में छिपती चाँदी की रेखा!

 मुझे मृत्‍यु की भीति नहीं है,
 पर अनीति से प्रीति नहीं है,
 यह मनुजोचित रीति नहीं है,
 जन में प्रीति प्रतीति नहीं है!

 देश जातियों का कब होगा,
 नव मानवता में रे एका,
 काले बादल में कल की,
 सोने की रेखा!

3. सुमित्रानंदन पंत की कविता चींटी

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा,
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! 

देखो ना, किस भाँति,
काम करती वह सतत, 
कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर,
विचरण करती, श्रम में तन्मय,
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

4. सुमित्रानंदन पंत की कविता पतझड़

झरो, झरो, झरो,
जंगम जग प्रांगण में,
जीवन संघर्षण में
नव युग परिवर्तन में
मन के पीले पत्तो!
झरो, झरो, झरो,

सन सन शिशिर समीरण
देता क्रांति निमंत्रण!
यह जीवन विस्मृति क्षण,--
जीर्ण जगत के पत्तो!
टरो, टरो, टरो!

कँप कर, उड़ कर, गिर गर,
दब कर, पिस कर, चर मर,
मिट्टी में मिल निर्भर,
अमर बीज के पत्तो!
मरो! मरो! मरो!

तुम पतझर, तुम मधु--जय!
पीले दल, नव किसलय,
तुम्हीं सृजन, वर्धन, लय,
आवागमनी पत्तो!
सरो, सरो, सरो!

जाने से लगता भय?
जग में रहना सुखमय?
फिर आओगे निश्चय।
निज चिरत्व से पत्तो!
डरो, डरो, डरो!

जन्म मरण से होकर,
जन्म मरण को खोकर,
स्वप्नों में जग सोकर,
मधु पतझर के पत्तो!
तरो, तरो, तरो!