Maithili Sharan Gupt Poems in Hindi

भारत देश के हिंदी साहित्य की विदेशो में बहोत चर्चा होती चली आरही है, Bharat में जन्मे महान Hindi Poet माननीय Maithili Sharan Gupt जी ने अपनी पूरी Life हमारे Nation को poetry में बहोत बड़ा योगदान दिया था Maithilisharan जी का Birth 3 अगस्त 1886 को झाँसी उत्तर प्रदेश में हुआ इनके Father का नाम रामचरण और माता का काशीबाई था। गुप्त जी का पढ़ाई लिखाई अपने गांव केवल 9 वर्ष तक ही हो पाई उसके बाद Famous Poems लिखना Start की जिसका नाम भारत भारती था।Nationalist होने के कारण इन्होंने ने Independence के लिए बहोत Struggle किया जिसके कारण Mahatma Ghandi ने Rajya Sabha से Literature Production में Padma Bhushan Award से नवाजा गया।
मैथली शरण गुप्त की हिन्दी कविता Poem on maithili sharan gupt hd images poster shayari SMS


मैथिलीशरण गुप्त की कविता मनुष्यता - Maithili Sharan Gupt Poetry in Hindi

विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी, 
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी। 
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये, 
नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए। 
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [1]

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी, 
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती। 
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती; 
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती । 
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे [2]

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही; 
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। 
विरूद्धवाद बुद्ध का दया प्रवाह में बहा,
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे, 
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [3]

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े । 
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी, 
अभी अमत्र्य- अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [4]

"मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है, 
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है। 
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है
परंतु अंतरेक्य में प्रमाणभूत वेद हैं। 
अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [5]

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, 
विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए। 
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी, 
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी। 
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [6]

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में 
सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में 
अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में 
दयालु दीन बन्धु के बड़े विशाल हाथ हैं। 
अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे [7]

भारत माता का मंदिर यह देशभक्ति कविता - Maithili Sharan Gupt Patriotic Poems in Hindi

भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का, 
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के 
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।

नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
ह्रदय पवित्र बना लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम ।
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम ।
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम ।

बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का 
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो
अपना हर्ष विषाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
एक एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

मुझे फूल मत मारो कविता - Maithili Sharan Gupt Small Poems in Hindi

मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, 
कुछ तो दया विचारो।
होकर मधु के मीत मदन, 
पटु, तुम कटु गरल न गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, 
ठहरो, श्रम परिहारो।

नही भोगनी यह मैं कोई, 
जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह--यह हरनेत्र निहारो!
रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो!

Maithili Sharan Gupt Best Small Poems in Hindi - प्रतिशोध हिन्दी कविता

किसी जन ने किसी से क्लेश पाया
नबी के पास वह अभियोग लाया।
मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं।
नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं।
उन्होंने शांत कर उसको कहा यों
स्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों।

चले भी तो कहाँ तुम वैर लेने
स्वयं भी घात पाकर घात देने
क्षमा कर दो उसे मैं तो कहूँगा
तुम्हारे शील का साक्षी रहूंगा
दिखावो बंधु क्रम-विक्रम नया तुम
यहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।

मैथली शरण गुप्त की Death 12 दिसंबर 1964 हो गई थी इन्होंने बहोत सारि रचनायें की जिनमे यशोधरा, रंग में भांग, साकेत, भारत भर्ती, पंचवटी, जय भारत, पृत्वी पुत्र , किसान, हिन्दू, आदि थे। इनके जयंती के दिन कवि दिवस मनाया जाता चला आ रहा है।