जूही की कली कविता | Juhi Ki Kali Kavita By Suryakant Tripathi Nirala

Juhi Ki Kali Kavita: हिन्दी साहित्य में एक बहोत चर्चित काव्य जिसे भारत के लोग बहोत पसंद करते है, जूही की कली कविता 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला' जी ने अपने लेखन कला से इसका लेखन किया हैं। इस सुंदर कविता में निराला जी Summery देते हुए बताते है की इस Poem में जूही की कली एक नायिका का रूप है जो अपने प्रेमी के मलयागिरी नामक पर्वत पे जाने से बहोत दुखी है और नायिका अपने प्रेमी के बारे में हमेशा ये सोचती है की उसका उसके प्रेमी से कब मिलन होगा। कवि ने नायक को पवन बताया है जो अपने प्रेमिका से दूर पहाड़ पे जाने से दुखी है नायक भी अपने प्रेमिका से मिलने को तड़प रहा है।

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जूही की कली कविता | Juhi Ki Kali Poem By Suryakant Tripathi Nirala in Hindi


विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी--स्नेह-स्वप्न-मग्न--
अमल-कोमल-तनु तरुणी--जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल--पत्रांक में,
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।

आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आयी याद कान्ता की कमनीय गात,
फिर क्या? पवन
उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली खिली साथ।

सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा माँगी नहीं,
निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही--
किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये,

कौन कहे?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती--
चकित चितवन निज चारों ओर फेर,
हेर प्यारे को सेज-पास,
नम्र मुख हँसी-खिली,
खेल रंग, प्यारे संग


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सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की ये बहु चर्चित कविता आपको बहोत पसंद आई होगी इनके द्वारा सेकडो कविता संग्रह को इस ब्लॉग पे बहोत जल्द प्रकाशित किया जाएगा साथ ही में इस कविता Juhi Ki Kali Kavita Poem Summary in Hindi दीया गया था जिसे आप को समझ आया होगा इसलिए आप से निवेदन करना चाहूंगा कि आप इस कथन को अपने मित्रो के साथ भी साझा करे जय हिन्दी साहित्य।