आज की कविता महिलाओं के ऊपर लिखी गई क्योंकि महिलाये ही जीवन का कारण है महिला दिवस पर हिंदी कविताएँ जिन्हें आप अपने कक्षा 1,2, 3,4,5,6,7,8,9, 10,11,12 मे निबंध में उपयोग कर सकते हे। हमारे समाज में महिला अपने अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक एक अहम किरदार निभाती है अपनी सभी भूमिकाओं में निपुणता दर्शाने के बावजूद आज के आधुनिक युग में महिला पुरुष से पीछे खड़ी दिखाई देती है।

पुरुष प्रधान समाज महिला की योग्यता को आदमी से काम देखा जाता है सरकार द्वारा जागरूकता फैलाने वाले कर्ड कार्यक्रम चलाने के बावजूद महिलाओं की जिंदगी पुरुष कि मैं जिंदगी के मुकाबले काफी जटिल हो गई है। अगर हम महिलाओं की आज की अवस्था को पौराणि समाज की स्थिति से तुलना करें तो साफ दिखाता है कि हालात में कुछ तो सुधार हुआ है। 
महिला दिवस पर हिन्दी कविताएं | Mahila Diwas Par Hindi Kavita
2021 Mahila Diwas Poem Hindi 


महिला नौकरी नौकरी करने लगी है घर के खर्चों में योगदान देने लगी है। कई क्षेत्रों में तो महिला पुरुषों से आगे निकल गए हैं। दिन प्रतिदिन लड़कियां ऐसे ऐसे कीर्तिमान बना रही हैं। जिस पर ना सिर्फ परिवार या समाज को बल्कि पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है।

हमने आज तक महिला को बहन,मां, पत्नी, बेटी आदि विभिन्न रूपों में देखा है। जो हर वक्त परिवार के मान सम्मान को बढ़ाने के लिए तैयार रहती है। शहरी क्षेत्र में तो फिर भी हालात इतने खराब नहीं है। पर ग्रामीण इलाकों में महिला की स्थिति चिंता करने योग्य है। सही शिक्षा की व्यवस्था ना होने के कारण महिलाओं की दशा दयनीय हो गई है एक औरत बच्चे को जन्म देती है। और पूरे जिंदगी उस बच्चे के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाती है। 

महिला दिवस पर हिन्दी कविताएं | Mahila Diwas Par Hindi Kavita  

मैं नहीं नीर भरी दुख की बदरी,..
मैं तो हूं जग की जीवन सृजनी।
हां, मैं जननी हूं,एक नारी हूं...
पर मैं आज की नारी हूं..
हां, मैं आज की नारी हूं।

मैं नहीं पतिता, अभिमानी,
मैं नहीं कंटक,किसीके पग की,
मैं नही गर्वीली गजगामिनी,
मैं नहीं सिर्फ श्रृंगार चमन की

मैं नहीं नीर भरी दुख की बदरी,..
मैं तो हूं जग की जीवन सृजनी।
हां, मैं जननी हूं,एक नारी हूं...
पर मैं आज की नारी हूं
हां, मैं आज की नारी हूं।

नही रही अब अबला, बेचारी,
नहीं रही आश्रिता,शोषित,
काल के कपाल पर रचती हूं,
अब मैं अपना एक इतिहास नया...

कंटकों के पथ पर सदा
साहस का गान लिखती हूं,
जीवन के हर पल में अब
एक नया उल्लास भरती हूं..

मैं नहीं नीर भरी दुःख की बदरी,
मैं तो हूं जग की जीवन सृजनी।
हां, मैं जननी हूं,एक नारी हूं...
पर मैं आज की नारी हूं
हां ,मैं आज की नारी हूं।

जीवन के गहन भंवर में,
लहरों पर संगीत रचती हूं,
प्रणय के अंतस क्षणों में
स्वप्निल संसार गढ़ती हूं...

स्वयं से हीं स्वयं का ,
साक्षात्कार करती हूं,
आंतरिक ऊर्जा से ,
नित नया आयाम गढ़ती हूं...

मैं नहीं नीर भरी दुःख की बदरी,
मैं तो हूं जग की जीवन सृजनी।
हां, मैं जननी हूं,एक नारी हूं...
पर मैं आज की नारी हूं
आज की नारी हूं।

अपने अस्तित्व को पहचानती हूं,
झुकती हूं तो झुकाती भी हूं,
संस्कारों के चौखट पर,
अपना स्वाभिमान भी रखती हूं।

ममता के आंचल में नित,
दृढ़ विश्वास रोपती हूं,
वातसल्य की मधुरिम छांव में,
अपना अस्तित्व भी संजोती हूं।

मैं नहीं नीर भरी दुःख की बदरी,
मैं तो हूं जग की जीवन सृजनी।
हां, मैं जननी हूं,एक नारी हूं...
पर मैं आज की नारी हूं
आज की नारी हूं।

सर्वाधिकार सुरक्षित
@अनुपमा पांडेय 'भारतीय'

राम की दुलारी
वो राम की ही प्यारी थी,
कभी बेटियां तो 
कभी बहू हमारी थी।

गर्भ में जो मारी
वो बहुत ही न्यारी थी
कभी मां तो
कभी बहन हमारी थी।

बिमारी  , बदहाली  में
कष्टों   की   दुश्वारी    में,
घर आंगन की चौखट पे
उसकी  ही पहरेदारी  थी।

श्वासो को मोहताज जो
जन्म  को  आभार  वो,
जन्म   देने   ‌वाली   भी
जन्म   को   लाचार  वो।

जिस देह दिया जन्म
उस देह का पूजारी तू,
गर्भ में जो मारी
वो देह भी हमारी थी।

पौरुष के पुरुषत्व में
ब्रह्मांड के अस्तित्व में
मारी आज तूने जो
उसकी भी हिस्सेदारी थी।

राम की दुलारी
वो राम की ही प्यारी थी,
गर्भ में जो मारी
उसी से दुनिया हमारी थी।

महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
बदले में वह कुछ भी नहीं मांगती है और पूरी सहनशीलता के साथ बिना तर्क किए अपनी भूमिका को पूरा करती है। आज अगर महिलाओं की स्थिति की तुलना सैकड़ों साल पहले के हालात पर की जाए तो यही दिखता है। महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा तेज गति से अपने सपने पूरे कर रही हैं। पर वास्तविक परिपेक्ष में देखा जाए तो महिलाओं का विकास सभी दिशाओं में नहीं  दिखता खासकर ग्रामीण इलाकों में अपने पैरों पर खड़े होने के बाद भी महिलाओं को समाज की बेड़िया तोड़ने में अभी भी काफी लंबा सफर तय करना है।

कई अवसरों पर देखा गया है कि महिलाओं के साथ नींद में दर्जे का बर्ताव किया जाता है उन्हें अपने दफ्तरों में भी बड़ी जिम्मेदारी देने से मना कर दिया जाता है। कई औरतें अपने साथ होते जुलुम को ही अपनी किस्मत मान लेती हैं। और तो उनके साथ हो रहा है इसके साथ ही अपना जीवनयापन कर लेती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला पिछड़ेपन का एकमात्र कारण सही शिक्षा प्रबंध का ना होना है। गांव में पुरुष भी अपनी जिंदगी का एकमात्र लक्ष्य ही मानता है कि उसे सिर्फ दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना है। ऐसे माहौल में पुरुषों से महिला सशक्तिकरण की उम्मीद करना बेकार है महिला अनपढ़ होते हुए भी घर इतना अच्छा संभाल लेती है। तो पढ़ी लिखी महिला समाज और देश को कितनी अच्छी तरह से संभाल लेगी।