रानी लक्ष्मीबाई पर कविताएँ | Poem on Rani Lakshmibai In Hindi

अभी की कविता रानी लक्ष्मी बाई जिन्हें हम झांसी रानी  के नाम से भी जानते है इसलिए आज झांसी की रानी पर कविता यानि रानी लक्ष्मी बाई पर कविता लिखी गई है ताकि विद्यार्थी जो कक्षा 1,2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 के क्षात्र है वे अपने निबंध परीक्षा में अच्छा कर सके।

रानी लक्ष्मी बाई को झाँसी की रानी के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म 19 नवम्बर 1835  में काशी में ब्राम्हण परिवार में हुआ था इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी था, लक्ष्मी बाई के बचपन का नाम "मणिकर्निका" था और प्यार से उन्हें सब मनु बुलाते थे आपने टीबी में देखा होगा, चौदह वर्ष की कम आयु में इनका विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव  कर दिया गया था। इसी लिए ये झांसी की रानी कहलाई इन्होंने 1057के स्वंतत्रता संग्राम में अहम योगदान दिया था ।

रानी लक्ष्मीबाई पर कविताएँ  Poem on Rani Lakshmibai In Hindi


रानी बहुत ही सुन्दर, चतुर और शास्त्र कला से निपुण थीं लक्ष्मी बाई ने कभी भी अपने आप को लड़को से कम नही माना लक्ष्मी बाई युद्ध भूमि में लड़ने वाली वीरांगना थी 23वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्य में मोर्चा लिया 18 जून 1858 में लड़ते - लड़ते ग्वालियर में उन्हें वीरगति प्राप्त हुई थी। 


5+ रानी लक्ष्मीबाई पर कविताएँ | Poem on Rani Lakshmibai In Hindi


सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुरी तानी थी. 
बूई भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरगी को करने की सबने मन में ठानी भी.

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह ती झाँसीवाली रानी थी।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी, 
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी, 
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,

वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद जबानी थी। 
बुदले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
 देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, 
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, 
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,

माराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी श्री।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 
राजमहल में बजी वधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, 
सुभट बुंदेलां की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई. 
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई. 
तीर चलानेवाले कर में उसे चूड़ियाँ पुत्र भाई, 
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई.

निःसंतान मरे राजा जी, रानी शोक-समानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौती मन में हरषाया,
 राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया.
 फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
 लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया, 
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया. 
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, 
राजाओं नब्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की. लिया लखनक बातों बात. 
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी 4/11 उदैपुर, 
तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात. 
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात.

काले, मद्रास आदि की अभी तो यही कहानी थी।
 बुंदेले हरबोलों से मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थीं बेजार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार, 
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार, 
'नागपुर के जेवर ले लो"लखनऊ के रानी हार,

यो परदे की इज्जत पर देशी के हाथ बिकानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

कुटियों में थी विषम वेदना, 
महलों में आहत अपमान, 
वीर सैनिकों के मन में था, 
अपने पुरखों का अभिमान,
 नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, 
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट 

हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो साई ज्योति जगानी थी। 
देसी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
 खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
 यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं, 
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुरी तानी थी. 
बूई भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरगी को करने की सबने मन में ठानी भी.

चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह ती झाँसीवाली रानी थी।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी, 
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,
 बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,

वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद जबानी थी। 
बुदले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, 
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, 
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, 
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,

माराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी श्री।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, 
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में, 
राजमहल में बजी वधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, 
सुभट बुंदेलां की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई. 
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई. 
तीर चलानेवाले कर में उसे चूड़ियाँ पुत्र भाई, 
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई.

निःसंतान मरे राजा जी, रानी शोक-समानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौती मन में हरषाया, 
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया. 
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, 
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
 व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया. 
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, 
राजाओं नब्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी।
 बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की. लिया लखनक बातों बात. 
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी 4/11 
उदैपुर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात.
 जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात.

काले, मद्रास आदि की अभी तो यही कहानी थी। 
बुंदेले हरबोलों से मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थीं बेजार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार, 
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार, 
'नागपुर के जेवर ले लो"लखनऊ के रानी हार,

यो परदे की इज्जत पर देशी के हाथ बिकानी थी। 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

कुटियों में थी विषम वेदना, 
महलों में आहत अपमान, 
वीर सैनिकों के मन में था,
 अपने पुरखों का अभिमान, 
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, 
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट 

हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो साई ज्योति जगानी थी। 
देसी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
 खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
 यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं, 
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
 बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी। 
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।


परन्तु जीते जी इन्होंने अपने राज्य झाँसी पर अंग्रेजों को कब्जा नही करने दिया ईनके पिता मराठा बाजीराव के सेवा में थे माँ के निधन के बाद मनु की देख रेख करने वाला कोई भी नहीं था। इसलिए पिता ने मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गये वहाँ मनु के स्वभाव ने सबका मन मोह लिया और लोगों ने उन्हें 'छबीली ' कहने लगे। 

शास्त्रो के शिक्षा के साथ-साथ शस्त्रो की भी शिक्षा मिली  1851 में रानी लक्ष्मी बाई और गंगाधर राव को पुत्र रतन की प्राप्ति हुई पर चार वर्ष की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गई। उधर गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। 

उन्होंने वैसा ही किया और पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को गंगाधर राव परलोक सिधार गये। उनके दत्तक पुत्र का नाम दामोदर रखा गया। अंग्रेजों की राज्य हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ़ लेप्स) और झाँसी:-ब्रिटिश इंडिया के गवर्नर जनरल डलहौजी की हड़प नीति के अंतर्गत अंग्रेजों ने बालक दामोदर राव को झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया। उम्मीद करता हु की आपको ऊपर लिखी गई कविताएँ बहोत पसंद आएगी।