मेरा गावं सबसे प्यारा सबसे सुंदर आज की कविता गावं के ऊपर कविता। हम सभी कविता को पड़ते और गावं या शहर के लॉगो को सुनाते है। आज की जो कविता है उसमें हम ये देख सकते है की गावं कितना सुंदर होता हमारे गावं में बकरिया, भैस ,गाय, जानवर रहते है जिनकी सेवा हम गांव वाले लोग रखते है।

आज की दुनिया मॉडर्न हो रही है जिसका बहोत बड़ा असर हमारे देश भारत पे पड़ा है यहां के लोग अब शहर की तरह जीने लगे है और  अपने गांव को छोड़ के घरों से निकल कर अब सहर की ओर जा रहे हैं।


गांव के ऊपर कविता। Poem On Village In Hindi 

Gaon Ka Jeevan Par Kavita


वो भी क्या दिन थे जब,
हम अपने गांव में रहते थे ,
इंटरनेट और पब्जी नहीं था,
साइकिल के पहिए चलते थे ।।

गिल्ली और डंडे के हम भी,
तेंदुलकर कहलाते थे,
जीते जाने पर यारों के,
कांधे पर टंग जाते थे ,
एक कटी पतंग के पीछे,
जब दस-दस दौड़ा करते थे ।।

रेस्टोरेंट् और माल नहीं था, 
पॉपकॉर्न और सिनेमा हॉल नहीं था ,
अम्मा की साड़ी पहनकर,
हम राम और सीता बनते थे,
वेद पुराणों की घटना जब,
हम मैदानों में रचते थे ।।

पिज्जा, बर्गर नहीं था,
पास्ता और चाऊमीन नहीं था,
अम्मा के चूल्हे में जब,
चोखा और मकुनी पकती थी ,
सोंधी सोंधी खुशबू लेकर,
हम देसी घी से खाते थे ।।

चोरी और व्यभिचार नहीं था,
बड़े, बुजुर्गों का तिरस्कार नहीं था ,
खेतों के मजदूर भी जब,
काका- काका कहलाते थे,
हर लड़की कर्णावती थी,
 तब हम भी हुमायूं बन जाते थे।।

 - ऋतु सिंह 

कविता का नाम मेरा गांव 

वो सूरज की अरुणाई थी 
या धरती की तरुनाई थी ,
उन पेड़ों की उस सर सर में
जाने कैसी शहनाई थी…….!

कुछ ओस की भीगी बूंदों में
वो कैसी अदभुत सरगम थी ,
मन भीगा था , तन भीगा था
वसुधा थोड़ी शरमाई थी…..!

खेतो की पीली सरसों भी
यौवन पर इतराती थी ,
वो धान रोपती बाला भी
थोडा़ सा इठलाती थी…..!

पीपल  के बूढ़े पेड़ों में
एक धूप का बड़ा झरोखा था  ,
ये मेरे गांव का यौवन था
बचपन में मैंने देखा था…..!

काका काकी , दादा दादी
घंटो हमसे बतलाते थे ,
कुछ अपनी बाते कहते थे
कुछ नई कथा सिखलाते थे…..!

अब शहर शहर मै जाता हूं
पर कुछ ना ऐसा पाता हूं ,
मै शहर में आज अकेला हूं
वो गांव अभी भी मेला है …….!
लेखक-सुनीता गुप्ता



 देहाती साँझ।

पंख समेटे तरु शिखरों पर,
जा बैठी चिड़िया मतवाली।
तेज चला रवि का बाजीरथ,
सिमटी धीरे-धीरे लाली।
लुप्त हो रही रवि की आभा,
क्षितिज बीच हो जाती ओझल।
लोट चले खग वृंद नीड़ पर,
कुहूँक भूल गयी अब कोयल।

लोट रहे बगुलें खेतो से,
हलवाये का साथ निभाकर।
बैलों की रुनझुन गलमाला,
बज उठती है राग बदलकर।
लोट रही गायो के खुर से,
उड़ती चमक उठी है गोरज।
पैरों की गति तेज हो गयी,
लोट चला अस्ताचल सूरज।

दिनभर वह माटी से खेला,
थका हुआ भरता धीरे डग।
हल की हाल रखे कंधे पर,
घर की ओर बढ़े उसके पग।
सोच रहा कल फिर आना हेै,
मन में पाल रखे है सपनें।
याद करे हँसते खेतो को,
मिट जाएगे दु:ख सब अपने।

छोड़ गया रवि अब शासन को,
और चाँद ने डोर पकड़ली।
डूब गऐ गहरे विषाद में,
गाँव गृह चौपाले देहली।
धीरे-धीरे नीलमणि पर
तारें आभा को पाते हैं।
जाड़े की भीगी रातों में,
लगते सपनों से जागे है।

थोड़ी चमक उठी रजनी अब,
चंद्र चला अपने यौवन पर।
कुत्ते भौक रहे गलियों में,
नीड़ छोड़ आए चमकादड़।
दूर कही झुन्डों में बैठे,
जोर-जोर से रोते गीदड़।
बीच बीच मगरोठी ठिठकें,
उल्लू बोल उठे शाखों पर।

घर के कोने में चूल्हें पर,
साग छोकती घर की नारी।
पास पड़ी छोटी मचिया पर,
हुक्के में तम्बाकू डाली।
आस पास बैठे है टाबर,
ले हाथों में खाली थाली।
दो काली चिद्दी रोटी ले,
चटनी से भर दे दी प्याली।

छपरे के आले की ढिबरी,
धीरे-धीरे लौ खोती है।
नहीं निशा से है लड़ पायी,
धुआँ उगलती वह रोती है।
कभी कभी जुगनू दे आभा,
उसका साथ निभा जाते हैं।
दीपों की माला से गुथँ कर,
बार- बार चमका आते हैं।

बाहर खड़े नीम के नीचे,
चौके पर एक धुनी जलती।
आस पास बैठे देहाती,
बाते सपनों को है बुनती ।
हुक्के की गुड़गुड़ में अपनी,
भूल गए वो यादें बीती।
अनुभव आते जब यादों में,
छा जाती खामोशी रीती।

धीरे-धीरे शाम खो गयी,
चारों ओर निशा गहरायी।
सभी हुए खामोश दूर से,
पेंचक की आवाजे आयी।
नीरव शांति भर गई बस्ती,
डूब गई गहरी निद्रा में।
निकल गया सारी बस्ती को,
अलसाया अजगर संध्या में।

रचना- हेमराज सिंह

मैं गाँव हूँ......

मैं गाँव हु, गाँव  ही  मेरी  पहचान,
रहती गाँव हुँ, गाँव मेरी अभिमान।।

 कमरे  कम पर   जगह पूरी रखती हूं,
सोचती कम पर समझ पूरी रखती हूं।।

 सड़कें-गलियां टेढ़ी पर सीधी चलती हूँ,
अलंकृत नही, शब्द  सीधी  बोलती  हूँ।।

डिजिटल नहीं हूं  पर मिल सबसे लेती हूँ,
कोई  कुछ  कहे  तो  प्रायः  सुन  लेती  हूँ।।

पड़ोसी   नही     रिश्ते    रखती    हूँ,
जाती, धर्म नही इंसानियत रखती हूं।।

मन  भरा पर दिल खाली रखती हूं,
जीतना जानती हूं पर हार जाती हूं।।

सीमाओं के बंधन से दूर खड़ी हूँ,
संकटो  से    जमकर   लड़ी    हूँ।।

 मकान छोटी पर इसी में खो जाती हूं,
गाँव   हूँ,     गाँव   मे   खो  जाती   हूं।।

 प्यार हूँ कई हिस्सों में बंट जाती हूं,
दुःखों के अश्रु अक्सर  पी जाती हूं।।

 पाताल से नहीं, तप्त रेत से निकली दरिया हूँ,
खुली    आसमान    के   नीचे   बह  जाती  हूँ।।

प्रकृति  को गोद मे लिए बिखरे रहती हूँ,
चरण फूल पर पड़े ख्याल पूरी रखती हूं।।

न कल की चिंता न कल की योजना,
आज में रहती हूं    आज में जीती हूँ।।

न आदि हु  न    अंत    हूँ,
मैं गांव हूँ गांव में रहती हूँ।।

प्रीतम

मेरा गाँव कविता आप को गांव शहर हिंदी कविता, गांव शहर कविता बहोत पसंद आई होगी। आज हर कोई अपने आप को बदल रहा है जो कि सही लेकिन उससे अपने आस पास को साफ रखना चाहिए।

इस कविता वाली दुनिया की कुछ और कविताये जीने आप को पढ़ना चाहिए ओर लोगो को भी बताना चाहिए। नीचे सारि कवितायें हिंदी भाषा मे है।