"वादा"

यही तुम्हारा वादा था कि 
फिर से बात करूंगी
अगर तुम्हारे गली से गुजरी
तो मुलाकात करूंगी

मैंनें गली से तुम्हें गुजरते 
नज़र चुराते देखा
आंखे नीचीं पलक झुकाकर
कर मुझको अनदेखा

मुझको तुमको पर क्रोध न आया
पर गम का अहसास हुआ
जो मेरे इतने करीब था
हुआ दूर, आभास हुआ

शायद मुझमें कमी हो कोई
जो तुम दूर हुई होगी
या सपनें कुछ ऊंचे होंगे
तो मज़बूर हुई होगी

मेरा प्यार नहीं कोई बन्धन
जो तुम्हें पाश में बांधेगा
गगन समूचा तुम्हें दिया तो
उड़ने से क्यों रोकेगा

बस यही है कहना, कभी मिलो तो
आंखे नहीं चुराना
मुझमें तुमको नहीं मिलेगा
कोई प्यार पुराना

बिन धड़कन भी, खुशी से जीते
तुम मुझको पाओगी
क्या खोया निज हाथों सोच के
तुम भी पछताओगी

प्रदीप कुमार झा,
गाजियाबाद